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रिश्ता

मानव जीवन के राहों पर विचित्र से रिश्ते मिलते हैं कुछ संग सदा हैं रह जाते कुछ प्रयोग कर चले जाते यह अपनी अपनी सोच है अपना अपना स्वभाव यह कुछ व्यक्ति में स्वार्थ बसा कुछ में है परमार्थ ही मात्र  यह तो कलयुग का साया है कल की सब हैं सोचा करते परंतु बेहतर आज बनाने को भावनाओं से बस खेला करते

बंधन

भरा रहे खुशियों से आंगन रहे सदा आनंदपूर्ण जीवन रहे पृथक द्वेष से तन मन जुड़ा रहे यूं प्रेमपूर्ण बंधन साथ जैसे कृष्ण सुदामा मिले हुए भले हो वर्षों यह प्रेम परंतु था अविराम  बंधन से मिलने की आशा चंद दिनों का डेरा वसुधा सुख दुःख का मेला रहता करना एक दूजे पर अर्पण अटूट रहे यह अपना बंधन

मिथ्या

मिथ्या अपनेपन की बातें मिथ्या चिंता औरों की स्वार्थ भरा सब के मन में फिक्र करें क्यों गैरों की दौर ये ऐसा जीवन का की वक्त नहीं अब है रहता मिलना जुलना हुआ दूभर हताश हर कोई रहता कार्यावधि बढ़ जाने से भला होगा कैसे संतुलन सामाजिक प्राणी मनुष्य समुदाय से उभरता जीवन

नवीन

हैं हर्ष –विषाद संग संग जीवन का बस यही रंग नवीन हर एक सुबह है हरेक संध्या बीते अंतरंग विस्तार होगा गगन का वसुधा में होगी हरियाली निरंतर सीखते चलो तुम निश्चय फैले वृक्ष की डाली नई सोच से ही हमेशा नया होगा तेरा जीवन सम्मुख बढ़ते चलो तुम अतीत से सीख हरदम

यादें

कभी कहती है थम जाओ सोचकर तब कदम उठाओ ले मुझे टटोल परख के तुम है क्या करना समझ जाओ मैं शायद राह दिखलाऊं बांह ले थाम बढ़ी आऊं हम यादें साथ सदा रहतीं जीवन में संग जुड़ी रहतीं भला बुरा को सोचकर भविष्य तुम्हारी देखकर रहेगा कैसा आगे सफ़र  ये यादें हीं तो बताती हैं

धुंध

छुप है जाती धुंध में प्रातः की हल्की धूप आकर्षण अलौकिक  सुदर्शन धरा का रूप ओस की बूंदें पत्तों पे भीनी खुशबू मन मोहे यूं ऊषा पहर में भूमि बादल की चादर ओढ़े छुप यूं आता है सूरज है ढूंढे जैसे शुभ मुहूर्त तिमिर–प्रकाश में द्वंद बैठ मुस्कुराता तब धुंध

मुखौटा

पहन मुखौटा अपनत्व का हृदयाघात करते कुछ लोग मुख पर बोलें प्रेम की बातें नीयत में पर रहती है खोट स्वार्थ हैं साधें साथ रहकर साथ न दें परंतु समय पर अजब गजब है उनका मेल हैं खेला करते केवल खेल मुख मुखौटा मन में मैल हैं अपनों से बढ़ाते बैर मैला जीवन मैला आंचल लाली नेत्र के न हैं काजल