मिथ्या
मिथ्या अपनेपन की बातें
मिथ्या चिंता औरों की
स्वार्थ भरा सब के मन में
फिक्र करें क्यों गैरों की
दौर ये ऐसा जीवन का की
वक्त नहीं अब है रहता
मिलना जुलना हुआ दूभर
हताश हर कोई रहता
कार्यावधि बढ़ जाने से
भला होगा कैसे संतुलन
सामाजिक प्राणी मनुष्य
समुदाय से उभरता जीवन
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