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प्राकृतिक संपदाएँ

पुष्पों की देन खुशबु मिट्टी का लहलहाते उपज वृक्ष फल देनें को आतुर वन मौसम को रखें सहज  बादल धरा की तृष्णा बुझाएँ जल से हर प्राणी मगन आकाश सुखद तापमान लाएँ वायु बनाए रखें जीवन पर्वतराज जैव विविधता आवास पशु पक्षियों का पर्यावर्णिक मूल्य वायु से सब लेते स्वास प्राकृतिक संपदाएँ सारे अमूल्य

चाह

माना कठिन है राह परंतु छोड़ना न चाह लक्ष्य प्राप्ति का आनंद तब जब पाओगे तोड़ बाधाएं लगन परिश्रम साथ हो ध्येय की कर दिखाना बस हो प्रयोजन चाहे कोई भी न रुकना, न थक जाना अब बस विश्वास रख, निश्चय रहे हो चाह यूँ, स्वयं राह कहे बढ़े चलो, रुको नहीं थको नहीं, झुको नहीं
दर्द को भी राजनीति में झोंक दिया कारोबार लाशों से किया साथ मिलकर था चलना जब वक्त को था बदलना जब नियत नहीं बदली गई असलियत उनकी वहीं रही गिद्ध का काम तो अस्तित्व का है इंसान क्यों कुछ गिद्ध बन गए सहारा सबको बनना था जब घृणा-पैसों से बढ़ शायद उनके लिए कुछ नहीं अंततः यह सिद्ध कर गए

सब अच्छा हो जाएगा

वक़्त कभी न ठहरा ये वक़्त भी गुज़र जाएगा कठिनाइयां हुईं माना कुछ अपनें गए, कुछ सपनें टूटे बेरहम, कब तक तड़पाएगा अंत हुआ हर काल का आशाएं, बस कुछ दिन में सब अच्छा हो जाएगा न रोकें कदम, न मानें हार होगा सकारात्मकता का जीवन में पुनः संचार ये कठिन वक़्त भी बीत जाएगा

भक्षक

कुछ अपनों ने ही चाल चली तब ही तो उनकी दाल गली कुछ काँटे थे जो पुष्पों की रक्षा न किए रक्षक होकर जो बेगाने उनका कहना क्या उनकी फ़ितरत सब जानते मकसद उनकी तबाही हीं वो राष्ट्र को राष्ट्र न मानते अपनेंपन की भूले सीख को क्या घृणा इतनी प्यारी उनको धूमिल की पहचान देश की क्या कहना ऐसे सारों को

हरो दुःख कृष्ण मुरारी

तुम्हारे आराधना में मन हाथों में पूजा की थाली रखें विश्वास हैं तुमपर हरो दुःख कृष्ण मुरारी विचलित चिंतित हैं हम सब विपत्ति है घर कर बैठी "ॐ शांति" बहुत हुआ यह शब्द ख़त्म करो ये परेशानी ख़ुशी से झोली फिर भर दो दुःखों का अंत तुम कर दो मचा हाहाकार राष्ट्र में जो हे कृष्ण, इससे मुक्ति दो 

उठ जा

उठ जा ये घडी परीक्षा की कुछ कर की राष्ट्र पुकारे अब लौ जला ह्रदय में अपनेपन का जो कर सके कर के दिखा बस मानवता की सोच रहे सेवा में न संकोच रहे कठिनाइयों से न डर रहे जो करना है बस वहीँ करें सेवा हीं अब बस ध्येय रखें मन में न तनिक संदेह रखें उठ जा की कदम बढ़ाना है न थकना न रुक जाना है