भक्षक

कुछ अपनों ने ही चाल चली
तब ही तो उनकी दाल गली
कुछ काँटे थे जो पुष्पों की
रक्षा न किए रक्षक होकर

जो बेगाने उनका कहना क्या
उनकी फ़ितरत सब जानते
मकसद उनकी तबाही हीं
वो राष्ट्र को राष्ट्र न मानते

अपनेंपन की भूले सीख को
क्या घृणा इतनी प्यारी उनको
धूमिल की पहचान देश की
क्या कहना ऐसे सारों को

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