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संसद भवन

भारत का इतिहास रहा अटूट सदा विश्वास रहा अडिग रहा अविरल रहा प्रजा का सदा साथ रहा भारत का अपना अभिमान अद्वितीय भारत का संविधान प्रजातंत्र का यह भव्य मंदिर भारत माता की है यह शान कलाकृति का प्रतिरूप अद्भुत देख होता हर एक मंत्रमुग्ध शीर्ष ऊँचाइयाँ उत्तम संरचनाएँ अनुपात संरेखण मन मोह जाएँ सुशोभित स्तंभ-दीवार चित्रकला उत्कीर्णन अद्भुत, अद्वितीय वास्तुकला  शिल्पकला का अतुलनीय उदाहरण राष्ट्रीयता को समर्पित यह संसद भवन अपनी इसकी अलग विशेषता राष्ट्र की ये सांस्‍कृतिक विरासत संसद भवन यह है अति सुंदर कलाकृति का जीवंत उदाहरण

यादें

शास्वत यादें अतीत की अनुभव दीक्षा सीख की जीवनपर्यंत रहे साथ में तपता सोना कुंदन बने कुछ सुगम कुछ भूल चूक कुछ ज्ञान कुछ यथा हीं रहे यादों की वो गहराइयां सदैव हीं उत्साहित करे बीता पल कुछ देकर गया अनागत जो क्षण आएगा यादों के ही सहारे वह भी तत्पश्चात पुनः मुस्काएगा

हौले हौले

बूंदें बारिश की हौले हौले  मां पृथ्वी का आंचल चूमें नहरों का जल हौले हौले  आ खेतों का दामन चूमें खेतों में उग आईं फसलें हरियाली से मैदान भर दें अन्न शाक फल लहलहाएं हौले हौले साथ हाट आएं हौले हौले चेहरे पर खुशियां सजे किसानों की तब दुनियां वर्षा नहर खेत फसल हाट देते हौले हौले संग विश्वास

अलक में छुपा चेहरा

चेहरे पर कौशेय सी अलक निहारती हो जो एक झलक लगे मदिर तुम्हारे जो ये दृग घने वन यूं विहारता ज्यों मृग लगती वधिक तेरी ये दृष्टि स्मित में तेरी समाई श्रृष्टि ताकना तेरा यूं पलट कर खो जाती मद तेरे लट पर इंद्रजाल यह अंगभंगिमा तुम्हारी सौंदर्यता अतुल अनुपम मनोहारी अनवरत अपलक देखना एकटक झुरमुट के पीछे जैसे कोई तुम्हारा कहीं छिपा लूं मैं इस पल को अलक दृग दृष्टि सौंदर्यता को निहारूं तुम्हें बस बैठ अनंतर जाए थम बस इस पल ये पल

बंद कर दी

जो समझते हो, समझो तुम ये तुम्हारी सोच, हमारा क्या तेरे लिए क्यों स्वयं को बदलूं औरों की सुननी, बंद कर दी जैसा हूं, हूं, बदलनी बंद कर दी भला हूं, भलाई लेनी बंद कर दी साफ हूं, सफाई देनी बंद कर दी कैसा हूं, गवाही देनी बंद कर दी कौन यहां उत्तम, कौन सर्वोत्तम अल्पता है सभी में हीं कुछ यहां मैंने तो किसी और की सोच पर अपनी हीं ध्यान देनी बंद कर दी अगर किसी के कहने पर उँगली स्वयं पर उठने पर अपनी मैं अच्छाई छोड़ दूं जीवन की दिशा मैं मोड़ दूं विचारों को अब औरों के अपनें ऊपर क्यों लूं भला बस, सुनने–समझने तक सुझाव लेनी हीं बंद कर दी

बस कह डाला

बस, मेरे मन की एक बात थी बिन सोचे–समझे, कह डाला कब तक बांध सा बंधा रहता खोल कपाट, नीर बहा डाला क्या बातें शायद तुम्हें पसंद नहीं शायद इस हेतु तुम सहमत नहीं पर कहना भी तो तुमसे है बनता बात कब तक हृदय में हीं रखता मेरे मन में कोई दोष नहीं मेरा तुमसे कोई रोष नहीं उर को शायद संतोष नहीं अभिलाषा तुम्हें कह डाली कुछ बातें ऐसी थी चल पड़ी भावनाएं मेरी अनियंत्रित थीं जिह्वा पर थे आए शब्द वहीं जो थे आए, वह कह डाली मेरा आना नियति हीं थी नहीं सोचा था मैं आऊंगा मिलना तुमसे विधि हीं थी इसे तोड़ मैं कैसे पाऊंगा था कुछ ऐसा परिवेश बना यूं लगता तेरे लिए आया मैं माना हूं नहीं मैं तेरी जीवनी तू लक्ष्मण मैं तेरा संजीवनी पूछो मुझसे, तेरा मोल क्या तुम मेरे लिए अनमोल सदा नित्य तुमनें मेरा साथ दिया जब हार गया, विश्वास दिया बाकी तो मन की बस बातें उजाले दिन अंधेरी वह रातें उजालों को बस खोना नहीं अंधेरों में तुम बस रोना नहीं मेरा साथ सदैव तेरे लिए है विश्वास सदैव तेरे लिए आंखें मूंद कर देखो तुम साथ मुझको बस पाओगे

मैं हूं

मैं हूं, शायद मैं नहीं हूं इस पुस्तक सा विस्तृत इन पन्नों के जैसा स्थिर ज्यों यह कप बिन चाय मैं नदियों सा हूं निर्मल शांत, स्वच्छ मेरा जल किसी तरी सा तीर पर अपनी सोच संग अचल है दीर्घकाय चौकी मेरी जिसमें मेरी काय समाए रेशम की चादर न मैली स्वच्छता का पाठ पढ़ाए