अलक में छुपा चेहरा

चेहरे पर कौशेय सी अलक
निहारती हो जो एक झलक
लगे मदिर तुम्हारे जो ये दृग
घने वन यूं विहारता ज्यों मृग

लगती वधिक तेरी ये दृष्टि
स्मित में तेरी समाई श्रृष्टि
ताकना तेरा यूं पलट कर
खो जाती मद तेरे लट पर

इंद्रजाल यह अंगभंगिमा तुम्हारी
सौंदर्यता अतुल अनुपम मनोहारी
अनवरत अपलक देखना एकटक
झुरमुट के पीछे जैसे कोई तुम्हारा

कहीं छिपा लूं मैं इस पल को
अलक दृग दृष्टि सौंदर्यता को
निहारूं तुम्हें बस बैठ अनंतर
जाए थम बस इस पल ये पल

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