बस कह डाला
बस, मेरे मन की एक बात थी
बिन सोचे–समझे, कह डाला
कब तक बांध सा बंधा रहता
खोल कपाट, नीर बहा डाला
क्या बातें शायद तुम्हें पसंद नहीं
शायद इस हेतु तुम सहमत नहीं
पर कहना भी तो तुमसे है बनता
बात कब तक हृदय में हीं रखता
मेरे मन में कोई दोष नहीं
मेरा तुमसे कोई रोष नहीं
उर को शायद संतोष नहीं
अभिलाषा तुम्हें कह डाली
कुछ बातें ऐसी थी चल पड़ी
भावनाएं मेरी अनियंत्रित थीं
जिह्वा पर थे आए शब्द वहीं
जो थे आए, वह कह डाली
मेरा आना नियति हीं थी
नहीं सोचा था मैं आऊंगा
मिलना तुमसे विधि हीं थी
इसे तोड़ मैं कैसे पाऊंगा
था कुछ ऐसा परिवेश बना
यूं लगता तेरे लिए आया मैं
माना हूं नहीं मैं तेरी जीवनी
तू लक्ष्मण मैं तेरा संजीवनी
पूछो मुझसे, तेरा मोल क्या
तुम मेरे लिए अनमोल सदा
नित्य तुमनें मेरा साथ दिया
जब हार गया, विश्वास दिया
बाकी तो मन की बस बातें
उजाले दिन अंधेरी वह रातें
उजालों को बस खोना नहीं
अंधेरों में तुम बस रोना नहीं
मेरा साथ सदैव तेरे लिए
है विश्वास सदैव तेरे लिए
आंखें मूंद कर देखो तुम
साथ मुझको बस पाओगे
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