मैं हूं
मैं हूं, शायद मैं नहीं हूं
इस पुस्तक सा विस्तृत
इन पन्नों के जैसा स्थिर
ज्यों यह कप बिन चाय
मैं नदियों सा हूं निर्मल
शांत, स्वच्छ मेरा जल
किसी तरी सा तीर पर
अपनी सोच संग अचल
है दीर्घकाय चौकी मेरी
जिसमें मेरी काय समाए
रेशम की चादर न मैली
स्वच्छता का पाठ पढ़ाए
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