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Showing posts from January, 2023

पिज़्ज़ा बर्गर

छत पर सूखता चिप्स छूटा छूटी बाजरे मक्के की रोटी घर वाली वह दलपिठ्ठी छूटी पिज़्ज़ा बर्गर खाएं बेटा बेटी गेंहू घर में अब नहीं आता पैकेट का खाते सब आटा कल पीते थे गन्ने को चूस अब पीते डिब्बे का जूस भूल गए खाना सब भुट्टा मुंह को अब कॉर्न भाता  नहीं पीता कोई नींबू पानी कोल्ड ड्रिंक में बीते जवानी

रोटी

नहीं चाहिए मुझको कपड़े मार धार पिटाई दंगे लफड़े घृणा द्वेष का ये स्थान नहीं दे दो मुझे एक पल की रोटी चेहरे पर यह डर नहीं दो लंबी उम्र का वर नहीं दो आशीर्वाद में दे दो खाना नहीं चाहिए मुझे ठिकाना कृपा बस इतनी कर दो मुस्कान से चेहरा भर दो आंखों में मेरी ज्योति दो मुझे एक पल की रोटी दो

अर्जुन युद्ध कर

अर्जुन, युद्ध करना हीं है यह धर्म तुम्हारा कहता है गांडीव उठा अब हाथों में अधर्म भला क्यों सहता है हर मार्ग तो हमनें है अपनाया दुर्योधन को कितना समझाया गुरुओं पितामह नृप मित्रों को समझाया विनाश का साथ न दो जब भ्रष्ट सभी की बुद्धि है तो मार्ग धर्म का युद्ध हीं है सोच भला किस बात की यहीं कर्म अब यहीं नियति हमनें भरसक प्रयास किए शांति के कितने मार्ग दिए उस राह ना उनको चलना साधन अब बस युद्ध करना तब तक हीं शांति की भाषा हो जब तक सद्बुद्धि की आशा हो पर जब अहंकार मुख रखे खोले युद्ध हीं उपाय तब यह धर्म बोले सहने की भी एक सीमा है कहनें को मुख में जिह्वा है जब बाण शब्द के पर्याप्त नहीं गांडीव में तब तरकश होना है उठ जा अब छोड़ निराशा को अपनें मन को यह दिलासा दो प्रयत्न किया बनाने मार्ग सुगम पर हाय ना समझा यह दुर्योधन विनाश का वक्त जब आता है अंधकार मस्तिष्क पर छाता है मिथ्या अहंकार परिपूर्ण जीवन होता समझ से परे धर्म–अधर्म उठ दे विराम तू इस सोच को अब चहुंओर देख कटिबद्ध खड़े हैं सब जन जन की अविराम दृष्टि तुझपर उठ घुटनों से अब केवल युद्ध तू कर

ठंड

कांपता शरीर मृदंग सा ठिठुरा है अंग अंग क्यों शीतलहरी देखो प्रचंड है वातावरण बहुत ठंड है न काम आए रजाईयां उसपर से ये तन्हाइयां सर से पांव तक लहर सूरज को ढूंढती नजर पाठशालाएं देखो बंद हैं कार्यालय मगर चल रहा घर से निकलने को वीर सकुचा सा, क्यों डर रहा प्रकोप ऐसा सर्दी का की जन जन क्षुब्ध है ये आई है तो जाएगी समय के साथ युद्ध है

सोच

नकारात्मकता को तुम रोक नहीं सकते नकारात्मक व्यक्ति को टोक नहीं सकते नहीं बदल सकते हो जब सोच तुम उनकी सोचना क्या भला, करें वो अपने मन की अपनी बात रखने से हिचकिचाना मत अपनी शक्ति कहीं भूल तुम जाना मत भाग्य में लिखा कोई छीन नहीं सकता कर्म जो तुम्हारे वहीं परिचायक हैं रहते संसार चलता है दोपहिए के सामान नदी के दो तट कभी एक नहीं होते चमकते तो हैं सदा चांद भी सूर्य भी सूर्य सदा उज्ज्वल, चांद चांदनी रात कोई टांग ना खींचे तो जीवन जीवन क्या कोई आंख ना मीचे तो तेरी उपलब्धि क्या मत हताश होना तुम औरों के कर्म से कर्म करते जाना सदैव अपना धर्म से

कहो, कैसे आना हुआ

अभी तक पूछते नहीं थे सदैव मुझसे रूठते हीं थे मिले मुझसे ज़माना हुआ कहो, कैसे आना हुआ ? बदला क्यों ठिकाना भला इतनें दिनों सब कैसा कटा क्या कठिनाई आन है पड़ी कहो, कैसे आना हुआ ? मतलब निकलते हीं भूल गए थे आवश्यकता जब थी दूर गए थे आज राह भला भटके हो क्यों कहो, कैसे आना हुआ ? कहो, क्या वियोग सह नहीं पाए कहो, क्या मेरे बिन रह नहीं पाए आज मेरी याद यूं आई कैसे भला कहो, कैसे आना हुआ ? मैं कोई प्रयोग की वस्तु नहीं मैं तिरस्कृत कोई सामान नहीं मन किया खरीदा, छोड़ दिया कहो, कैसे आना हुआ ? मैं विश्वास का हूं द्योतक सही इस सोच में मुझसा कोई नहीं यहीं सोच पुनः आए हो क्या कहो, कैसे आना हुआ ? हां, मैं साथ निभाता हूं संग हर राह में जाता हूं ये मेरी कमज़री हीं सही कहो, कैसे आना हुआ ? मेरी प्रवृति तो हांथ थामने की अगला कैसा ये ना जाननें की क्या पुनः कोई छल है मन में? कहो, कैसे आना हुआ कहो, संकोच करो ना तुम कहो, तनिक डरो ना तुम कहो, जो बात दबी मन में कहो, कैसे आना हुआ ?

हमारी अधूरी कहानी

जुबां पर नाम चीज़ क्या जब दिल में बसे हो तुम तुझसे हो इंतकाम क्या जब लगते अपने हो तुम कभी कुछ मजबूरी होती है तब हीं कभी यूं दूरी होती है दूरियां भी तो अच्छी बात है पुनः मिलन एक जज़्बात है एक पल भी तुम्हें मैं भूल न पाता हूं सोचूं तुम्हारे बारे में पर कह न पाता हूं तुम यूं मेरी यादों में बसे हो हर एक पल आज भी सोचता हूं सोचता था तुम्हें कल उम्र के उस पड़ाव में बैठें हैं अभी हम तुम क्या ये होना जायज़ या कहीं हमारी भूल पर ये भी सोचता हूं जो भी है, अच्छा है चाहना एक दुजे को नहीं कोई खता है दुआ है ये तुमसे मिलूं जो कह न पाया, कहूं मन की बातें सारी कह दूं मन की बातें सारी सुन लूं सच है, प्रेम की उम्र नहीं होती भावनाओं का क्या, उमर पड़ती कुछ ख्वाब जो अधूरे हैं रह जाते समय के साथ उनकी पूर्ति होती कुछ खो जाते जो जीवन की राहों में पुनः आ जाते हैं हमारी हीं पनाहों में  अपना मिलना भी शायद लिखा था ये कोई करिश्मा शायद उस खुदा का बस एक दूजे को गलत न समझना  ये नियति है, न की हमारा भटकना और जीवन में जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए हीं होता, ये भरोसा है