अर्जुन युद्ध कर

अर्जुन, युद्ध करना हीं है
यह धर्म तुम्हारा कहता है
गांडीव उठा अब हाथों में
अधर्म भला क्यों सहता है

हर मार्ग तो हमनें है अपनाया
दुर्योधन को कितना समझाया
गुरुओं पितामह नृप मित्रों को
समझाया विनाश का साथ न दो

जब भ्रष्ट सभी की बुद्धि है
तो मार्ग धर्म का युद्ध हीं है
सोच भला किस बात की
यहीं कर्म अब यहीं नियति

हमनें भरसक प्रयास किए
शांति के कितने मार्ग दिए
उस राह ना उनको चलना
साधन अब बस युद्ध करना

तब तक हीं शांति की भाषा हो
जब तक सद्बुद्धि की आशा हो
पर जब अहंकार मुख रखे खोले
युद्ध हीं उपाय तब यह धर्म बोले

सहने की भी एक सीमा है
कहनें को मुख में जिह्वा है
जब बाण शब्द के पर्याप्त नहीं
गांडीव में तब तरकश होना है

उठ जा अब छोड़ निराशा को
अपनें मन को यह दिलासा दो
प्रयत्न किया बनाने मार्ग सुगम
पर हाय ना समझा यह दुर्योधन

विनाश का वक्त जब आता है
अंधकार मस्तिष्क पर छाता है
मिथ्या अहंकार परिपूर्ण जीवन
होता समझ से परे धर्म–अधर्म

उठ दे विराम तू इस सोच को अब
चहुंओर देख कटिबद्ध खड़े हैं सब
जन जन की अविराम दृष्टि तुझपर
उठ घुटनों से अब केवल युद्ध तू कर

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