ठंड

कांपता शरीर मृदंग सा
ठिठुरा है अंग अंग क्यों
शीतलहरी देखो प्रचंड है
वातावरण बहुत ठंड है

न काम आए रजाईयां
उसपर से ये तन्हाइयां
सर से पांव तक लहर
सूरज को ढूंढती नजर

पाठशालाएं देखो बंद हैं
कार्यालय मगर चल रहा
घर से निकलने को वीर
सकुचा सा, क्यों डर रहा

प्रकोप ऐसा सर्दी का
की जन जन क्षुब्ध है
ये आई है तो जाएगी
समय के साथ युद्ध है

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