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मत कहो तुम, राम आए हैं

सच कहो, क्या राम आए हैं ? छोड़ हमें पर गए कहाँ वो थे ह्रदय में हरपल राम रहते हैं मत कहो तुम, राम आए हैं  देश के हर कण में राम जी हरेक के जीवन में राम जी शांत जो स्वभाव सनातन का हैं शीलता सिखलाए राम जी तोड़ा गया निलय था उनका मन की भावनाएं यथावत थीं एक उनका आलय था नहीं  धाम उनका हर भवन में था नाम सदा प्रत्येक आँगन में कर्म उनका हरेक कार्यों में राम कभी कहीं गए हीं न थे मत कहो तुम, राम आए हैं 

शब्द

मन में तो बात बहुत हैं लेकिन शब्द नहीं आते शब्द हृदय में छुपके हैं भावनाएं बन जाते न कहने से व्यग्रता कहने से डर लागे शब्द कठिन बहुत आए, आकर भागे शब्द मन की बोली शब्द हृदय की भाषा शब्द अधूरे तब तक उसे लिखा नहीं जाता शब्दों का जाल फैलाएं और हर इच्छाएं पाएं

याद

होते कितने खूबसूरत यादो के झरोखे मन जब अशांत चले यादो के भरोसे अच्छी–बुरी हो यादें साथ सदैव रहती न होना तुम विचलित सीख देती रहती यादें जीने का सहारा ज्यों नदी का किनारा हो जिनसे पृथक तन याद करता उनको मन याद फरियाद सा चाहे फिर से साथ साथ जब न मिले रह जाती बस याद

आंसू

कीमत है तुम्हारे इन आंसुओं की इन्हें व्यर्थ न हीं बहाओ तो अच्छा यह तेरे चेहरे की ज़ीनत नहीं कोई तुम बस सदा मुस्काओ तो अच्छा ये जो जीवन है, चुनौतियों से भरी तुम संभाल लोगी, है विश्वास मुझे बस हार मत मानना तुम कभी भी खुशियां तुम्हारा दामन छोड़ेगी कैसे माना आज दर्द तुम्हारा है बेहिसाब छांट देगी अंधेरा है तू वो आफताब तुम केवल स्वयं पर रखना विश्वास कठिनाई यूं जाएगी न होगा आभास जैसे मुस्कुराती हो, मुस्कुराती रहना रोक सकती है तू आंसुओं का बहना वक्त के हर सितम को रहते है सहना  तुम्हारा खिला चेहरा हीं तुम्हारा गहना तुम वो पुष्प, जिससे तेरा घर सुगंधित माहौल कर दे खुशनुमा, हो तुम वो इत्र कभी भी इस खुशबू को न व्यर्थ करना आंसुओं की शक्ति नहीं आंखों से बहना

भारत देश

हिमालय से सागर तक भारत रेगिस्तान संग ले वर्षावन तक हैं विविध बड़ी भूमि भारत की खानपान भाषाएँ मोह ले जातीं एक सूत्र में है बंधा यह देश भिन्न वस्त्र या अलग हो वेश जोड़ता हमें इतिहास हमारा भारत है हम सब को प्यारा करें जो पृथक करनें की बातें संगठन को वह क्या हीं जानें है युगों युगों का साथ हमारा संग हाँथों में यह हाँथ हमारा  कहे संविधान हम भारत के लोग लग चूका कुछ को विलग का रोग मन मस्तिष्क में उनके द्वेष भरा है पर सारा भारत यहाँ साथ खड़ा है सहनशीलता बसी लहू में हमारे विभिन्नता में एकता साथ पुकारे छोड़ दो सोचना बाँटने का तुम हो जाओगे वर्ना कहीं पन्नों में गुम 

बाग बगीचे

यह बाग बगीचे सब यहीं रह जाएंगे कलियां खिलेगीऔर पुष्प मुस्काएगें धरा पे खुशबू की होगी बरसात जब आसमान तक सब हीं मुग्ध हो जाएंगे एक ऋतु आएगी एक ऋतु जाएगी बाग बगीचे में नव पुष्प वह लाएगी फल फूल हों न हों, आभा रहेगी हीं हर ऋतु आएगी, हर ऋतु जाएगी जो भी खिलते हैं, वो हीं मुरझाएंगें सत्य ये जीवन का बतला के जाएंगे जाओ बिखेर खुशबू इस दुनियां में यह बाग बगीचे सब यहीं रह जाएंगे

जज्बा जांबाजों का

न हीं टूटा है, न टूटेगा सबल था, अटल रहेगा अक्षम अंग, जज़्बात नहीं दम उनमें फौलाद सा हीं मन, हृदय हारा नहीं है न सोंचते, सहारा नहीं है स्वयं में हीं सेना सम है शेष हरदम दम जज्बा जाबाजों का ऐसे डटा हुआ हिमालय जैसे सोच केवल राष्ट्रहित हीं धन्य पुत्रों से मां भारती