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Showing posts from April, 2025

काश

काश ऐसी मुलाकात हो हम तुम हीं बस साथ हों हाथों में तुम्हारा हाथ हो अनंत आपस में बात हो कह दूं तुमसे दिल की बात कह दे मुझसे दिल की बात बीत गए देखो बरस कितने  अब तो बदलें अपने हालात कहीं साथ हम एकांत चलें एक दूजे से फिर ऐसे मिलें और तोड़ दे बंधन सारे हम हो जाए हममें मधुर मिलन डूब जाऊं फिर यूं तुझमें मैं  तेरी कोमलता महसूस करूं भर मुझको अपनी बाहों में मेरी शीतलता महसूस करे कर मुझको ऐसे आलिंगन लगे जैसे हो यह कोई स्वप्न हम खो जाएं आपस में ऐसे ये कोई मधुर सपना हो जैसे नजरें नजरों पर टिकी रहे उम्मीद की चादर बिछी रहे और दूरी यह हो जाए कम हो जाए हममें मधुर मिलन

वो क्षण

जब आया था मैं तेरे शहर में मन में मिलने की कामना थी मगर न मिल सका मेरा दोष मिलूं, न मिलूं यह भावना थी रूठी थी तुम मुझसे उस वक्त तेरी नाराज़गी सच में जायज़ और फिर आई तुम मेरे शहर मिलन हुआ हमारा उस पहर तेरे आने की तुझसे मिली ख़बर तुझसे मिलने को रहा मैं बेसबर आई घड़ी जो तुमसे मिलन की लगा जैसे कि वक्त है गया ठहर मिलन की आस थी, वक्त पर ऐसा लगा कि आ पाऊंगा मैं या की नहीं आया जो मिलने को तुझसे प्रियतम ठहर गई थी उस वक्त वो घड़ी वहीं है तुझमें आज भी ठहराव वैसा ही सच तुझमें आज भी बहाव वैसा ही बदली होगी शायद तुम, न मुझे लगा तुझको देखते ही हो गया मैं लापता चले गए संग बरसों पुराने दौर में यादें ताज़ा की बहुत तुम और मैं हँसते हुए लम्हें गुजारे साथ साथ अभी भी दोनों में वैसा ही विश्वास उस वक्त भी देखा तुम्हारा अपनापन तुम्हारी सौम्यता संग तेरा सलोनापन पल बीता वो खुशनुमा तुम्हारे साथ में  लग रहा था वो था तो नहीं कोई स्वप्न कभी था कश्ती मैं और तुम मझधार थी किसी वक्त तुम मेरी एकतरफा प्यार थी वह एक वक्त था वक्त कबका बीत गया अभी वर्तमान है कबका वह अतित गया बीता वो पल एकदूजे संग हँसते बोलते कुछ इतिहास के...

माया

जी भर तेरा प्यार चाहता हूं मैं हुस्न का दीदार चाहता हूं महसूस करना चाहूं तुम्हें ही बस यहीं एक बार चाहता हूं सहलाना चाहूं गेसुओं को तेरे उनकी खुशबु में डूब जाऊं मैं एक एक लट को तेरे संवार दूं आओ तुम्हें जी भर प्यार दूं मैं चूमना चाहूं तुम्हारे ललाट को जगाऊं तुम्हारे भी जज़्बात को सच में तुम बहुत सकुचाती हो भावनाओं को कह न पाती हो नारी की कामना तब उभरती जैसे हीं स्पर्श नर का है होता रति की बनाई यह एक माया कामदेव ने सदैव इसे निभाया है तेरे मन का मेल मेरे मन से क्यों रखें पृथक इसको तन से एक जैसी हीं हमारी भावनाएं तो क्यों नहीं हम एक हो जाएं

केश

ज्यों जगमग नभ में राकेश हिम से जैसे परिपूर्ण शैलेश सुंदरता अद्वितीय झलकती चमकीले ज्यों ये तुम्हारे केश श्याम वर्ण की जैसे सहचर स्वेत यथा बुलबुला समंदर तनिक सुलझे, जरा उलझे लगते लुभावन तेरे कुन्तल रमणीयता तेरी करे सुशोभित केशों की लहरें करें विमोहित स्याह रंग के संग मेल खाए विविध वर्ण संग केश प्रवाहित उसपर तेरा नयन मटकना उस पर मीठी तेरी मुस्कान चेहरे संग जंचते हैं कुन्तल लगे तुझ पर बड़े मनभावन

सच्चाई

कब तक ये आंधियां रोकेगी  किसी कश्ति को मझधार में साहिल पर ले कर आएगा नाविक उसको हर हाल में तरणि तट पर तो आएगी हरेक कठिनाइयां चीड़ती गंतव्य वह अपना पाएगी निष्ठुरता से सदैव जूझती होगा सहकार पतवार संग जलधारा संगी बन जाएगी और संग पड़ाव को पाने में वो हवा भी साथ निभाएगी जीवन की राहों में सदैव मिलेंगे स्नेही भी रिपु भी सुहृदय मनुज होंगे साथ देंगें जो हर क्षण विश्वास जो राह में कंटक लाएंगे कल पुष्प वहीं बिछाएंगे पहचान आपकी सच्चाई यथार्थ से परिचय पाएंगे

हम–तुम

लम्हें गुजारे कितनें, तेरे इंतज़ार में डूबे रहे बस याद में, तेरे हीं प्यार में तू आएगी, कह कर ये आई तू नहीं न आऊंगी, यह भी कह दिया कभी तू आई थी, बातें कई की थी हमनें  लम्हें कई मुस्कुरा संग काटी हमनें संग चेहरे पर, खुशी की लकीर थी मिलना हमारा ऐसे, जैसे नज़ीर थी आना तेरा विश्वास था, एक दूजे पर यूं हसीं सा रहे, जब तक संग सफर किसी मोड़ पर न, अलग हों हम कभी तकरार होना लाज़मी, रिश्ता रहे जभी मन में कोई दुर्भावना नहीं रही कभी हित सदैव एक दूसरे का सोचते रहे आए वियोग के पल भी, जो ठीक थे नाराज़गी में भी पर, पृथक न हम हुए यकीन था, इसी यकीं ने पास ला दिया इसी यकीं ने हरपल, एक राह था दिया जिस राह हम बेझिझक चल रहे अभी ऐतबार आपस का पर टूटा नहीं कभी नहीं डिगा कभी भी, हो कोई भी घड़ी भले कितनी मुश्किलें, थीं राह में पड़ी था यह समर्पण मन का, सदैव हीं रहा दूरियों में भी अपना, रिश्ता जुड़ा रहा खुशी में एक दूसरे के, थे साथ हम दूरी में भी सदा, बांटा है हमनें ग़म  हमराज हीं आपस में, सदा बने रहे यह रिश्ता अपना बस, ऐसा हीं रहे पलट के जो देखते, अपने साथ को हैं याद आती की गई, हरेक बात वो विश्वसनीय सदा रह...