Posts

भारत देश

हिमालय से सागर तक भारत रेगिस्तान संग ले वर्षावन तक हैं विविध बड़ी भूमि भारत की खानपान भाषाएँ मोह ले जातीं एक सूत्र में है बंधा यह देश भिन्न वस्त्र या अलग हो वेश जोड़ता हमें इतिहास हमारा भारत है हम सब को प्यारा करें जो पृथक करनें की बातें संगठन को वह क्या हीं जानें है युगों युगों का साथ हमारा संग हाँथों में यह हाँथ हमारा  कहे संविधान हम भारत के लोग लग चूका कुछ को विलग का रोग मन मस्तिष्क में उनके द्वेष भरा है पर सारा भारत यहाँ साथ खड़ा है सहनशीलता बसी लहू में हमारे विभिन्नता में एकता साथ पुकारे छोड़ दो सोचना बाँटने का तुम हो जाओगे वर्ना कहीं पन्नों में गुम 

बाग बगीचे

यह बाग बगीचे सब यहीं रह जाएंगे कलियां खिलेगीऔर पुष्प मुस्काएगें धरा पे खुशबू की होगी बरसात जब आसमान तक सब हीं मुग्ध हो जाएंगे एक ऋतु आएगी एक ऋतु जाएगी बाग बगीचे में नव पुष्प वह लाएगी फल फूल हों न हों, आभा रहेगी हीं हर ऋतु आएगी, हर ऋतु जाएगी जो भी खिलते हैं, वो हीं मुरझाएंगें सत्य ये जीवन का बतला के जाएंगे जाओ बिखेर खुशबू इस दुनियां में यह बाग बगीचे सब यहीं रह जाएंगे

जज्बा जांबाजों का

न हीं टूटा है, न टूटेगा सबल था, अटल रहेगा अक्षम अंग, जज़्बात नहीं दम उनमें फौलाद सा हीं मन, हृदय हारा नहीं है न सोंचते, सहारा नहीं है स्वयं में हीं सेना सम है शेष हरदम दम जज्बा जाबाजों का ऐसे डटा हुआ हिमालय जैसे सोच केवल राष्ट्रहित हीं धन्य पुत्रों से मां भारती

दिवाली ऐसे मनाएंगे

कुछ चेहरे पर हों खुशियाँ कुछ आँखों में हो भरोसा मिट्टी से बने हों जो दीपक उनसे जगमग हो झरोखा भरा हो माँ का आँचल हर बच्चे ख़ुशी से झूमें उदर न खाली किसी का माँ लक्ष्मी सभी को चूमें स्वागत यूँ श्री राम का झोली न हो कोई खाली हर हाँथ में हो मिठाई ऐसे सबकी मने दिवाली

चाय

गांठ बांध लो मेरी राय कितनी भी समस्याएं बैठ कहीं तू सुकून से पी बस एक कप चाय कठिनाई से क्यों घबराए चुनौतियां जितनी आए हल तुम्हारे मस्तिष्क में हीं सोच तू लेकर हांथ में चाय करे शीतल दिमाग गर्म चाय मार्ग जीवन का नज़र आए बाधाएं स्वयं राह बतलाए आनंदपूर्ण जीवन बन जाए

विश्वास

नदी का तट पर है विश्वास बहती तब हीं है अनायास बिखरूंगी मैं नहीं तब तक जब तक तट है, है आभास घने वन में हैं पशु विचरते हैं चिंतारहित चलते फिरते विश्वास, कोई शिकारी नहीं आभास, उनकी दुनियाँ यहीं भक्त का प्रभु पर है विश्वास कठिन राहों में मिलेगा साथ टूटूंगा नहीं, हैं लेते यह प्रण  कोई हो न हो, संग भगवन रहता जब विश्वास अटल जीवन का हर मार्ग सरल संचार हर्ष का हो हर पल बहाव जीवन का हो तरल कर ले कोई कितना भी छल कपट न जिनमें वो हैं निर्मल शस्त्र जिनका है होता विश्वास सदा परमात्मा का रहता साथ मानव की पहचान बनी है विश्वास तोड़ना आम बना मिथ्या प्रगति पाने को देखो क्या से क्या यह इंसान बना कोई किसी का क्या करेगा जिसने किया है वहीं भरेगा ये घड़ा पाप विश्वासघात का न्याय योग्य होगा जब भरेगा दिया हुआ ये अवसर पहचानो बदलो स्वयं को तुम अब मानो यूं विश्वास तोड़ना उचित नहीं है विश्वास पर हीं तो सृष्टि टिकी है

सिख

अमरीका कनेडा यूके औसी बहुल हैं वहां खाली से स्थान ये दस गुरुओं की पुण्यभूमि सिखों का रहेगा ये हिंदुस्तान गुरु नानक से गुरु गोविंद जी जन्में इस पावन धरती पर ही किया ज्ञान का प्रचार प्रसार सिखों का इस धरती से प्यार प्रेम सूत से है बंधा यह तन मन सिख भारत का जुड़ा है जीवन है मातृभूमि यहीं पितृभूमि यह सिखों की हीं यह धरती पावन भला तोड़ेगा कौन साथ इनका अंग भारत भी इनके शरीर का तन–मन–धन भारत माता का मां भारती हैं सिखों की माता