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सिख

अमरीका कनेडा यूके औसी बहुल हैं वहां खाली से स्थान ये दस गुरुओं की पुण्यभूमि सिखों का रहेगा ये हिंदुस्तान गुरु नानक से गुरु गोविंद जी जन्में इस पावन धरती पर ही किया ज्ञान का प्रचार प्रसार सिखों का इस धरती से प्यार प्रेम सूत से है बंधा यह तन मन सिख भारत का जुड़ा है जीवन है मातृभूमि यहीं पितृभूमि यह सिखों की हीं यह धरती पावन भला तोड़ेगा कौन साथ इनका अंग भारत भी इनके शरीर का तन–मन–धन भारत माता का मां भारती हैं सिखों की माता

चेतना

गर जीवन के कठिन मार्गों दुष्कर कार्यों को हो भेदना युक्ति सतत प्रयास केवल न अन्य विचार पर चेतना हो चित्त जब भी निराश आस का न हो दृष्टिपात स्वयं पर रखना विश्वास सप्राण हो तुम्हारी चेतना कठिनाइयों को बेधकर  उन चुनौतियों से चेतकर बढ़ता जा तू डगर–डगर सानंद जीवन का सफर

फिर कभी... नहीं कभी

अभी तो आरंभ है, यह आत्मा स्वतंत्र है करेंगे बात बैठकर, कहानियां फिर कभी साथ में उमंग हो, आत्मविश्वास प्रचंड हो पराजय विजय की, निशानियां फिर कभी देना अभी तो साथ बस, बढ़ाना विश्वास को अभी न यह सोचना, की देगा क्या साथ वो कदम अभी तो साथ है, हर क्षण उत्साह भी इंसान के सच्चाई की, कहानियां फिर कभी थमे हीं नहीं थे पग मेरे, टूटे नहीं वचन कभी कठिनाइयां आती रहीं, साथ डगमगाती रही इस मोड़, उस मोड़ पर, यहां वहां, इधर उधर जो जैसा वो वैसा हीं, जानना उन्हें फिर कभी ये पल बीत जाएगा, सिखा कुछ यह जाएगा सीखना या भूलना, समझना या अंजान बस नियत क्या नियति, क्या सोच, कैसी जिंदगी मन में सब समेटकर, कहूंगा कुछ नहीं कभी व्यवहार एवम उदारता, हर वक्त को संभालता मूल्य कोई समझे नहीं, विद्वेष हीं क्यों लगे सही जाना बस ये सीखकर, है छल कपट वास्तविक परिवर्तन रही पहचान नहीं, बदलूंगा मैं नहीं कभी

राह

चल पड़े हम राह पर, सपने लिए कई सुकून मिले की जब मंजिल दिखाई दे कठिनाइ जितनी भले, राहों में आ पड़े पहुंच जाएं मंजिल पर, रास्ते गवाही दें

हवस

जब तक वश में रहता मन संपूर्ण रहता सदैव जीवन खुशियों का संचार है होता संतुष्टि का आधार ये होता हवस बस एक पागलपन जिस्म की हो या की धन बेचैन रहता हर पल मन विषपूर्ण हो जाता जीवन वश में जब तक हवस मधुर हो जीवन का रस जाए हवस जब हो अनियंत्रित मानवता का अंत हो सुनिश्चित

हवस

यह गफलत क्यों है यूं शिकायत क्यों है यूं सताना बता भला तुम्हारी आदत क्यों है मन में मेरे आज भी जाने क्यों संशय है तू समझती नहीं मुझे कैसा तुम्हारा हृदय है तुम्हें पाने की जो मैं एक अभिलाषा रखता हूं ये हवस नहीं प्रेम है मेरा तुम्हें अपना समझता हूं सर से पांव तक बस तुम्हें चुमना चहता हूं आंखें बंद कर तुम्हारे जिस्म में डूबना चाहता हुं मेरे लिए वो एक मंदिर पवित्रता जैसे गंगा सी मेरे लिए वस्तु पूजा की जिस्म तुम्हारा, आत्मा तेरी भर कर तुम्हें अपनी बाहों में हर गम तुम्हारे पास से ले लूं जो भी खुशियां मेरे जीवन में आ लिपट जा, तुम्हें सारे दे दूं डूब जाएं एक दूसरे में हम इस कदर, कुछ याद न रहे प्रेम तो तुम्हें भी मुझसे है लब तुम्हारे कहें, ना कहें आत्मा तुम्हारा है आत्मीय मुझको आदतें भी तुम्हारी, है प्रिय मुझको परंतु पाना शरीर, तेरा मेरा लक्ष्य नहीं चाहता हूं तुम्हें, जिस्म की हवस नहीं जिस्म का मिलना एक आधार है तुम तो मुझे सदैव हीं स्वीकार है जिस्म जब एक हो जायेंगें हमारे एक हो जायेंगें, नभ चांद तारे

धोखा

अब वो पल मुझे याद न आएं अब उनकी याद पास न आए न आऊंगा कभी बातों में अब मैं धोखा न खाऊंगा कभी अब अदाओं से अपनी मुझको रिझाया अपनापन दिखा मुझे अपना बनाया तोड़ मेरे दिल को उन्होंने क्या पाया हंसती रहीं खुद और मुझको रुलाया मैंने किया उनपर विश्वास हरपल दिया साथ उनका हरेक मोड़ पर दामन कभी मैंने छोड़ा न उनका मेरी हीं किस्मत गए छोड़ मुझे वो यहीं नियति सच यहीं तो नियत है यहीं हैं खिलाड़ी यहीं खेल सब है यहां मन तुम्हारा खिलौना है केवल यहां भावनाओं की कदर हीं नहीं है एक प्रयोग बस तेरी जिंदगानी इतनी सी छोटी सी तेरी कहानी न समझा इसे तू ये गलती है तेरी ये आंसु तुम्हारे यूं हीं व्यर्थ नहीं हैं