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यात्रा

कुछ देते साथ, विश्वास सदैव रहने का आभास कुछ ठोकर भी राहों में कांटे जो चुभाते पावों में यात्रा जीवनपर्यंत चलता यात्री है कई राह बदलाता थक रुक के आगे बढ़ता अपना भाग्य स्वयं बदलता है जीवन गमन का नाम पड़ाव पा करना विश्राम रुकावटों से आगे बढ़ना अपनी कथा स्वयं गढ़ना

तीसरा लोक

लोक तीसरे की बात निराली लाता यह जीवन में हरियाली सामयिकी से अवगत कराता अद्यतन यह स्थिति बतलाता अंजान बनते है अभिन्न मित्र सुगंधिहीन जीवन में ज्यों इत्र हर माहौल में साथ ये देता सही उपयोग कराता डेटा हर पल को ये मधुर बनाता जन जन को साथ ये लाता ये नहीं बस एक महज़ संयोग अपनत्व बढ़ाता तीसरा लोक

अब जाता हूं .....

बस यहीं तक यह आसमान  अब आगे कोई और जहान एक यात्रा का पड़ाव आया एक यात्रा का बहाव आया कुछ तारे जगमग मैं छोड़ चला कुछ अंधकारमय पल थे बीते कभी था सूरज मेरे आंचल में कभी अमावस में थे रैन बीते पर अंबर कभी झुकने न दिया विस्तार नभ का रुकने न दिया आंधियां भी चलीं तूफान आए था थामा सब अपनें दामन में कभी अपनों ने विश्वास दिया कभी अपनों ने न साथ दिया कुछ पल में हर्ष का मेला था कुछ पल थे जब अकेला था पर नभ सा मैं विशाल रहा हर कोई मुझको भाया था आते थे भले बादल काले टिकते न थे, थे बरस जाते अंधेरों को पर टिकने न दिया और तारों को बिकने न दिया वो चकोर जो थे घेरे चंदा को उन चकोरों को मिटने न दिया अब जाता, पर इस चिंतन में ये भी एक क्षण था जीवन में मुझमें पर कोई बदलाव नहीं हां, मैं जैसा हूं, वैसा हीं सही

संसद भवन

भारत का इतिहास रहा अटूट सदा विश्वास रहा अडिग रहा अविरल रहा प्रजा का सदा साथ रहा भारत का अपना अभिमान अद्वितीय भारत का संविधान प्रजातंत्र का यह भव्य मंदिर भारत माता की है यह शान कलाकृति का प्रतिरूप अद्भुत देख होता हर एक मंत्रमुग्ध शीर्ष ऊँचाइयाँ उत्तम संरचनाएँ अनुपात संरेखण मन मोह जाएँ सुशोभित स्तंभ-दीवार चित्रकला उत्कीर्णन अद्भुत, अद्वितीय वास्तुकला  शिल्पकला का अतुलनीय उदाहरण राष्ट्रीयता को समर्पित यह संसद भवन अपनी इसकी अलग विशेषता राष्ट्र की ये सांस्‍कृतिक विरासत संसद भवन यह है अति सुंदर कलाकृति का जीवंत उदाहरण

यादें

शास्वत यादें अतीत की अनुभव दीक्षा सीख की जीवनपर्यंत रहे साथ में तपता सोना कुंदन बने कुछ सुगम कुछ भूल चूक कुछ ज्ञान कुछ यथा हीं रहे यादों की वो गहराइयां सदैव हीं उत्साहित करे बीता पल कुछ देकर गया अनागत जो क्षण आएगा यादों के ही सहारे वह भी तत्पश्चात पुनः मुस्काएगा

हौले हौले

बूंदें बारिश की हौले हौले  मां पृथ्वी का आंचल चूमें नहरों का जल हौले हौले  आ खेतों का दामन चूमें खेतों में उग आईं फसलें हरियाली से मैदान भर दें अन्न शाक फल लहलहाएं हौले हौले साथ हाट आएं हौले हौले चेहरे पर खुशियां सजे किसानों की तब दुनियां वर्षा नहर खेत फसल हाट देते हौले हौले संग विश्वास

अलक में छुपा चेहरा

चेहरे पर कौशेय सी अलक निहारती हो जो एक झलक लगे मदिर तुम्हारे जो ये दृग घने वन यूं विहारता ज्यों मृग लगती वधिक तेरी ये दृष्टि स्मित में तेरी समाई श्रृष्टि ताकना तेरा यूं पलट कर खो जाती मद तेरे लट पर इंद्रजाल यह अंगभंगिमा तुम्हारी सौंदर्यता अतुल अनुपम मनोहारी अनवरत अपलक देखना एकटक झुरमुट के पीछे जैसे कोई तुम्हारा कहीं छिपा लूं मैं इस पल को अलक दृग दृष्टि सौंदर्यता को निहारूं तुम्हें बस बैठ अनंतर जाए थम बस इस पल ये पल