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Showing posts from January, 2025

रिश्ता

मानव जीवन के राहों पर विचित्र से रिश्ते मिलते हैं कुछ संग सदा हैं रह जाते कुछ प्रयोग कर चले जाते यह अपनी अपनी सोच है अपना अपना स्वभाव यह कुछ व्यक्ति में स्वार्थ बसा कुछ में है परमार्थ ही मात्र  यह तो कलयुग का साया है कल की सब हैं सोचा करते परंतु बेहतर आज बनाने को भावनाओं से बस खेला करते

बंधन

भरा रहे खुशियों से आंगन रहे सदा आनंदपूर्ण जीवन रहे पृथक द्वेष से तन मन जुड़ा रहे यूं प्रेमपूर्ण बंधन साथ जैसे कृष्ण सुदामा मिले हुए भले हो वर्षों यह प्रेम परंतु था अविराम  बंधन से मिलने की आशा चंद दिनों का डेरा वसुधा सुख दुःख का मेला रहता करना एक दूजे पर अर्पण अटूट रहे यह अपना बंधन

मिथ्या

मिथ्या अपनेपन की बातें मिथ्या चिंता औरों की स्वार्थ भरा सब के मन में फिक्र करें क्यों गैरों की दौर ये ऐसा जीवन का की वक्त नहीं अब है रहता मिलना जुलना हुआ दूभर हताश हर कोई रहता कार्यावधि बढ़ जाने से भला होगा कैसे संतुलन सामाजिक प्राणी मनुष्य समुदाय से उभरता जीवन

नवीन

हैं हर्ष –विषाद संग संग जीवन का बस यही रंग नवीन हर एक सुबह है हरेक संध्या बीते अंतरंग विस्तार होगा गगन का वसुधा में होगी हरियाली निरंतर सीखते चलो तुम निश्चय फैले वृक्ष की डाली नई सोच से ही हमेशा नया होगा तेरा जीवन सम्मुख बढ़ते चलो तुम अतीत से सीख हरदम