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भारत के आम लोग

।।  भारत के आम लोग    ।। हम भारत के आम लोग भारत को स्वर्ग बनाएंगे आएंगे कितने दशतगर्दी कदमों तले झुकाएंगे ये देश जान से प्यारा है ये दिल और जान हमारा है हम भारत माँ के बेटे हैं माँ को न कभी रुलाएँगे जब तक तन में है लहू कीमत मिट्टी की चुकाएंगे

चाँद से गुफ्तगू

।।  चाँद से गुफ्तगू   ।। स्वप्न के बीच इच्छाओं को समेटे चाँद से गुफ्तगू की कल रात चाँदनी संग बताई कई बात क्यों है दरार चमकता क्यों सारी रात छुपता बादलों में क्यों अमावस क्यों, क्यों पूनम रात क्यों निहारे धरती को नीला क्यों है गात खुशियाँ गम सारे बयाँ कर गया चाँद उस रात मन अपना हल्का कर गया

सितारों की दुनियाँ

।।  सितारों की दुनियाँ    ।। आसमान के उस पार एक दुनियाँ सितारों की विस्तृत अनंत अपार संग असंख्य सहचर समेटे हुए कई भेद कितनी रहस्यमय होतीं विचरण करें प्रत्यक्ष उन्मुक्तता में दक्ष  न होने का दर्प न खोने का डर न कोई क्लेश रहते सदा मुखर

सिख धर्म

।।  सिख धर्म   ।। साथ दिया विश्वास दिया माँ भारती को सिखों ने सदा गुरुओं का आशीर्वाद रहा इस धरती को आभास रहा न झुके न ही झुकने दिया कितने ही संताप सहे संगठित हुए सामना किया खून पसीने से सींचा देश अफगानों मुगलों का प्रतिकार किया स्वतंत्रता संग्राम में अडिग रहे सेना के बन सम्मानित सैनिक सीमाओं पर डटे हुए

खादी

  ।।  खादी ।। थी राष्ट्र में स्वतंत्रता की आंधी संग्राम चरम पर आया था बहिस्कार हुआ विदेशी वस्त्रों का जब देश में खादी छाया था हर घर में एक ज्वाला सी थी सब संग गाँधी के चल पड़े पहचान बनाई खादी को विदेशी कपडे जल पड़े पहचान रही राष्ट्रीयता की न केवल एक वस्त्र खादी जगा दिया था स्वावलंबन चरखे ने दिलाई आज़ादी

खादी

।।  खादी ।। पहचान स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास मोहनजोदड़ो से चला वस्त्र नहीं विचार है खादी आत्मनिर्भरता स्वरोज़गार है खादी गाँधी जी का साथ रहा स्वदेशी आन्दोलन में अग्रणी खादी की पहचान रही सदैव स्वावलंबन से ही हाँथों से बनता यह वस्त्र सूत चरखे पर कातकर कपास, रेशम, ऊन के बुने गए कपड़े होते गर्मी में ठंड, ठंड में गर्म खादी की पहचान यहीं विरासत भारतीय वस्त्रों का दें खादी का साथ सभी

श्री राम

।।  श्री राम ।। आगे बढ़ो अब ठान लो श्री राम का बस नाम लो धाम अयोध्या नगरी में भव्य मंदिर का निर्माण हो हो आपके योगदान से मन में हरी के नाम से प्रभु राम पहचान राष्ट्र के होंगें स्थापित जन्मभूमि में मन दर्शन को व्याकुल सा होने को समाप्त शुन्य अब पुरुषोत्तम की राह पर चलता रहा सदा देश यह