एक हीं पल में

जब भी ये लगता है
तुम पास हीं तो हो
तुम दूर चले जाते
बस एक हीं पल में

जब भी ये लगता है
तुम ख़ास हीं तो हो
तुम पराया बना देते
बस एक हीं पल में

तोड़ देते हो मेरा सपना
हूं मैं तो तुम्हारा अपना
मैं यह सोचता रहता सदा
यूं हीं तब हर एक पल में

मैं क्या हूं तुम्हारे लिए
यह समझ न पाया मैं
प्रयत्न तो बहुत किया
सोचा, पर निरुत्तर रहा

तुम्हें कोई अंतर न पड़ता
यूं छोड़ना तुम्हारी आदत
जब चाहती हो चाहुँ तुम्हें
जब चाहती हो भूल जाऊं?

पर यूं साथ नहीं होता
विश्वास यूं नहीं होता
हर वक्त एक सी रहो
या तो मुझे छोड़ हीं दो

कब तलक इस दर्द में जिऊं
उस फलक में तारे क्यों गिनू
जब टूटता नहीं कोई भी तारा
जब बनेगा नहीं तू मेरा सहारा

तो ऐसी कशमकश में भला 
जीवन अपना क्यों बिताना
जब मिलना हीं नहीं साथ
तो स्वयं को क्यों तड़पाना

तुम न तो हां ही कहोगे
न हीं तुम ना हीं कहोगे
इस उधेड़–बुन में भला
मुझे जीवन क्यों बिताना

बात तो तुम समझते हो
हो ख़ास तुम समझते हो
और मेरे इस अपनेपन की 
जज़्बात तुम समझते हो

तुमने मुझे खिलौना समझा
प्रीयतम बस खेला है मुझसे
शायद यह तो मेरी नियति है
विश्वास किया था मैंने तुझपे

ये माना की मुझमें भी त्रुटि
निष्कलंक तू भी बनी नहीं
भिन्नता है दोनों में बस इतनी
की खेलना मैंने सीखा नहीं

तुझसे क्यों सौहार्द हुआ
मैं हीं तो यहां गलत था
परंतु था मैं अकेला नहीं 
मन में तेरे भी ललक था

तेरे लिए बस प्रयोजन था मैं
नहीं कभी भी लोभन था मैं
मुझे भी ये मालूम था परंतु
निश्छल और निश्चल था मैं

तुमनें केवल वेदना हीं दी
मेरे मन की चेतना हीं ली
विश्वास है मेरा तोड़ा तुमने
मंझदार में ला छोड़ा तुमने

मुझे बस इतनी कसक सी
जानता था तब भी संग था
चूँकि तु अकेली लगती थी
नियत नहीं गलत घड़ी थी

दोष मेरा प्रायश्चित भी मेरी
है पर मेरा स्वभाव हीं ऐसा
नहीं छोड़ सका था तुझको
ईश्वर ने न मुझे बनाया ऐसा

न कभी मुझसे टकराओगी तुम
नहीं पास मेरे फिर आओगी तुम
बस देख मुझे तुमआगे बढ़ जाना
न तेरी गली में होगा मेरा ठिकाना

साथ तुम्हारा देना हीं था
घाव हृदय में लेना हीं था
ये दोष नहीं तेरी चिंता थी
बननी जिसे मेरी चिता थी

अब इसमें जल जाऊंगा मैं
पलट फिर नहीं आऊंगा मैं
है इस सोच की मृत्यु अच्छी
जल राख हीं बन जाऊंगा मैं

मुझे तुम अब याद न आना
मन अब मेरा नहीं रिझाना
प्रतिज्ञा बस इतनीं कर जाना
बदल गया अब मेरा ठिकाना

अपने अंतःकरण में खुश रहता
पाने को न कुछ व्याकुल रहता 
ये जीवन मेरा अत्यंत सरल सा
व्याकुलता नहीं कभी मेरा रास्ता

अब चलता यादों को लेकर
अधूरे कुछ सपनों को लेकर
विनती अब तुमसे बस ये की
जीना जीवन छल से हटकर

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