गुस्से से घूरना तुम्हारा
वो नजरों से चुपके से
देखकर तेरा मुड़ जाना
बड़े हीं गौर से तकना
गुस्से से झटक जाना
तुम्हारी हरकतें कहती
भले तुम चुप हो रहती
इशारे कह हीं देते सब
निगाहें बोल हीं देती हैं
नहीं कहना तुम्हें कुछ भी
न मुमकिन यूं दूर हीं रहना
तेरे जज्बात को मैं समझूं
नहीं सहना तुम्हें कुछ भी
मगर मुझसे अलग हो क्यों
क्यों दिल को थाम बैठी हो
क्यों सकुचाती भला हो तुम
क्यों घबराया सा तेरा चेहरा
मुझे अब तक ये शक था
मोहब्बत तुमसे बेशक था
तुम्हारे मन की बेचैनी उफ
पता न था मुझको हीं कुछ
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