मूर्खों की संगोष्ठी

मूर्खों की संगोष्ठी में

एक मूर्ख और आया

चर्चाएं थी मूर्खों की

स्वयं को विद्वान बताया

पूछा सबमें प्रेम नहीं क्यों

विस्मृत आँखों से उत्तर पाया

सारे हुए बड़े अचंभित

क्यों ध्येय समाज हित

इसको प्रेम की क्यों पड़ी

जब जगत में घृणा घनी

यह तो है महामूर्ख

तभी इसका चेहरा सुर्ख

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