आज़ादी का अमृत महोत्सव
वक़्त भी था ठहर गया
असंतोष का वातावरण था
जब राष्ट्र की स्वाधीनता हेतु
देशभक्तों नें गोलियां खाई थीं
लम्हा बस यादों का छोड़ गए
थे सबको आपस में जोड़ गए
आँधी ऐसी थी चल पड़ी
चिंगारी आग थी बन गई
देन उन
वीरों की स्वाधीनता
कितनों के बलिदानों से मिला
जब शासन है बहरा रहता
तोड़ दो शीशे, समय
कहता
प्रयत्न कई संघर्ष कई
कितनों ने दी बलिदानी
अज्ञात कई विख्यात कई
अनगिनत लोगों की कहानी
आज़ादी मनका एक ऐसी की
कई मुक्ता हैं इसके सूत में
न बिसरना कभी उनको जो
चले गए बसे बस हैं
सुध में
स्वतंत्र हम कारण उनका संघर्ष
मनाते आज़ादी का पर्व
सहर्ष
जिस उत्सव के निमित्त हर उत्सव
अपनीं आज़ादी का अमृत महोत्सव
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