थोड़ी है ...
केवल न मिट्टी, प्राण बसते हैं
हार मांस वाले, इंसान रहते हैं
पर्वतराज हिमालय, तीन ओर सागर
फैली है धरा पर, भारत मां का आंचल
अहिंसा कभी हमारी, पहचान थोड़ी है
लूटना औरों को, अपना काम थोड़ी है
अपनापन का पाठ, पढ़ाया सदा सभी को
आशीर्वाद है, किसी के श्राप का हिंदुस्तान थोड़ी है
पारसी हों या आइरिश, शरण दिया इस भू ने
विश्व को किया सुगंधित, इस धरा की खुशबू ने
धर्मनिरपेक्षता स्वाभाविक, शालीनता लहू में
पीठ पर भोंकना छुरी, अपनी पहचान थोड़ी है
दोगे प्रेम अगर तुम, प्रेम हीं पाओगे
साथ सदा रहेगा, पास में हीं पाओगे
दोगलों, द्रोहियों, नाशियों गांठ लो अब ये
पापियों, कुटिलों का ये हिंदुस्तान थोड़ी है
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