अपनों से भी सोच कर बोलूँ ?
मुझमें सच्चाई है, बातों में रुबाई है
बस, कहने से पहले, सोचता
नहीं हूँ
मुझमें इतनी सी कठिनाई है
विचित्र ये अपनेपन की दुहाई
है
पर मेरी बात का बुरा मत
मानना
मुझको ह्रदय से अपने मत
निकालना
मैं तुम्हें अपना समझता
हूँ
एक खूबसूरत सपना समझता हूँ
इसलिए ज्यादा सोचता नहीं
जो मन में आए, कहता वहीँ
अब अपनों से भी सोच कर बोलूँ ?
नापुं, तौलूं, तब मुँह खोलूँ ?
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