सोच

सोच 

NAVNEET


।। 
सोच ।।


जब सच की राह पर चलते हैं

स्वयं को न बदलते हैं

ये बात उन्हें पसंद नहीं

वो कठिनाई पैदा करते हैं


राह दुष्कर हो जाता है

कभी कभी यूँ है लगता

कुछ भी समझ न आता है

पर उसी राह पर चलते हैं


कभी लगता है ऐसे क्यों हैं

क्या स्वयं को बदल नहीं सकते

पर बदलें भी तो कैसे हम

पहचान मेरी तो है यहीं


हर भांति के लोग यहाँ

किसी का जीवन झूठा है

कोई सच के राह पर चलता है

ये सोच है अपनी अपनी


तुम अपने मार्ग पर चलते हो

हम राह पर अपने अडिग रहें

न मेरी सोच से तुम बिखरो

न तेरी सोच से हम उखड़ें


- नवनीत








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