स्त्री का सम्मान

स्त्री का सम्मान 
NAVNEET

।। स्त्री का सम्मान ।।

कठिनाइयों से स्तब्ध नहीं,
अकेली हूँ, उपलब्ध नहीं।
जो होनी थी, सो हो गयी,
वो होनी थी, वो हो गई।

वो दुःख का पल था, बीत गया,
आगे था कितना वक़्त पड़ा।
मैंने हार पर मानी नहीं,
खुद में थी कुछ ठानी रही।

मेरी अपनी सोच,
मेरी अपनी ज़िन्दगी।
छिन गया था कुछ मेरा,
क्या उसके बिन मैं जीती नहीं।

अपने कदम आगे बढाए फिर,
और खुद को एक स्थान दिया।
एक लक्ष्य फिर निर्धारित की,
पाने को उसको कर्म किया।

कुछ लोगों का था साथ मिला,
कुछ ने पर खींचे हाँथ भी।
पर पथ पर अपने अडिग रही,
क्यूंकि साथ था मेरे मेरा ध्येय।

मैं चलती हूँ पर बिना थके,
ये राह मेरी न रुके।
आप अपनी सोच पर स्थायी रहें,
मैं अपनी राह पर चलती हूँ।

मैंने निश्चित कर रखी नियत अपनी,
मैं अपने पथ पर निकलती हूँ।
मैं नारी हूँ, मुझमे सम्मान,
महत्व अपनी मैं समझती हूँ।

- नवनीत 
  

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