हर वक्त का कुछ हासिल है उसमें ये वक्त भी शामिल है जो ये सोचते हैं वह टूट गया हर एक भ्रम ही उनका टूटेगा तुम होगे खिलाड़ी सयाने कोई तुम्हें लगता होगा, बस मैं हीं हूं है अभी अभिमान बहुत तुमको यह क्षणिक घमंड तुम्हारा टूटेगा जिसका कर्म ही केवल विध्वंस हो समझे स्वयं को कृष्ण, पर कंस हो जो यह समझे कि मैं तो अजेय हूँ हिसाब कर्म का उसपर भी फूटेगा भले यह राह कठिन पर चलना है हर कठिनाइयों को तो निगलना है छांट अंधकार को रौशनी आती है तप कुंदन सा तू की यह पौ फटेगा पूर्णतः क्षणभंगुर ये अहंकार उनका एक दर्पण सम केवल संसार उनका अभी देख स्वयं को बहुत इठलाते हैं देखोगे तुम, उनका यह दर्पण टूटेगा
तुम इतनी अच्छी जो हो, तुम इतनी प्यारी जो हो। मन है तेरा कितना सुंदर, सुंदरता की हो तुम सागर। तुझे जैसा पहले देखा था, अभी भी तुम वैसी हीं हो। बदली होगी औरों के लिए, मेरे लिए बिल्कुल वैसी हो। तुझमें अपनापन दिखता है, सुकून सा जीवन दिखता है। सब मैं कह सकता हूं तुझसे, मन में जो बात समझती ऐसे। तुम सदैव बस ऐसी हीं रहना, हो तुम मेरे जीवन का गहना। मेरी एक अभिन्न मित्र हो तुम, हो मत जाना मुझसे तुम गुम।
न जाए जो मन से ऐसी स्मृति हो तुम ईश्वर की एक अनुपम अद्वितीय कृति हो तुम साथ तुम्हारे मुझको सदा क्यों अपनापन सा लगता ख़ुशियों भरे बिताए जो पल एक सुंदर स्वप्न सा लगता करूँ मैं बातें जब तुझसे मन मेरा खिल उठता तुम्हारी हसीन मुस्कान से तन क्यों सिहर उठता लगती बोली में तुम्हारी कोयल सी मधुर मिठास बढ़ा देती है अक्सर क्यों मेरे मन की प्यास हर पल तुम्हें निहारूँ आँखों में तुम्हें बसा लूँ नज़रों से ओझल होनें न दूँ इस तरह दिल में छुपा लूँ तुम जो ख्याल रखती हो मुझको संभाल रखती हो ये तुम्हारा अपनापन ही है मन अपना विशाल रखती हो एक बार तुम्हें पाना चाहता हूँ तुझमें डूब खो जाना चाहता हूँ तुम्हारे हृदय में एक कोना चाहता हूँ जी भर कर तुझमें खोना चाहता हूँ इसे मेरी आस कह सकती हो या कह सकती हो मेरी प्यास चाहता हूँ न जानें क्यों तुझको स्वयं से ज्यादा तुझपर विश्वास खो जाऊँ यूँ तुझमें की फिर ऊबर न पाऊँ मैं चाहता हूँ शायद तुम्हें इतना कहीं कुछ कर न जाऊँ मैं
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