बड़ा चमत्कारी था चक्रव्यूह फंस गया जिसमें अभिमन्यु बाहर आने का था बोध नहीं उसे भेदने का था ज्ञान परंतु हो रही चर्चा कैसे बाहर जाएं कैसे चक्रव्यूह तोड़ सब पाएं कहते युधिष्ठिर बढ़ आगे पुत्र संग पीछे हम सारे योद्धा आएं चला वीर तब सबसे आगे थे रौद्र रूप देख शत्रु भागे गोलाकार घूमता चक्रव्यूह चला गया भेदता अभिमन्यु एक दिवस वरदान था जयद्रथ को सब पांडव हारेंगे, छोड़ अर्जुन को था रोक लिया हर एक को उसने साहसी धनुष गदाधारी थे जितने था चला अकेला धर्मपथ पर भेद छः चक्र जा पहुंचा अंदर जहां एक नहीं सात योद्धा थे वह सारे एक से एक भयंकर हो रहा चहुंओर से आक्रमण भटका नहीं पर किंचित मन बाणों से परंतु भेदा हुआ तन पटी शोणित से धरा की कण घेरा गया था हर एक दिशा से यथा व्योम में चंद्रमा निशा से विदित था, वीरगति निकट थी नहीं चेहरे पर भय की रेखा थी मन में तनिक चिंतायुक्त कर्ण मनन हो अंत क्षण में जीवन इस बालक को कष्ट नहीं हो भोंक दिया पल में खंजर को सत्य मार्ग कठिन ही होता बाधाएं अनगिनत हैं रहती बढ़ना है तो बन अभिमन्यु होता नहीं कोई अजातशत्रु
मित्रता कृष्ण और सुदामा मित्रता राम सुग्रीव समान रहे चाहे जैसा यह जीवन रखती मित्रता इसका मान सुख दुःख में सदैव मित्र खुशबू जीवन ज्यों हो इत्र मित्र हमेशा साथ निभाते संग सदैव हीं हंसते गाते साथ बचपन कल अटूट है भरा विश्वास कूट कूट मन की हर बातें कह देते मित्र जो हर पीड़ा हर लेते ये साथ रहे ऐसा हीं सदैव मित्र हीं तो धन और वैभव मित्र तो हैं जीवन का आय मित्रता तब ही सबको भाय
होता दिल पर असर जैसा भी रहता सफ़र राह हर्ष पीड़ा का मेला बढ़ता जा राही अकेला पथ मिलेंगे कई तरह के ये देख तू इनमें न भटके मोड़ बहुत से आएंगे किंतु मुड़ना तुम देख समझ कर रास्ते ये आराम भी देगें रास्तों में कष्ट भी होगा रुक न जाना थम न जाना बढ़ते हुए मंजिल को पाना
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