रूप
मालुम नहीं मुझे की मेरा यह कितना सुंदर रूप है कहते तुम की परी सी मैं और मेरे चेहरे पर धुप है मैं नहीं जानूँ मूल्य अपनी तू कहे की हूँ मैं मूल्यवान मैं पुष्प किसी बगिया की तू कहे है तू मेरा बागवान मैंने निज में कुछ न देखा तूने तो नित मुझको देखा ऐसा क्या भला क्या मुझमें न कर सके मुझे अनदेखा मुझको तुम प्यारी हो सबसे सच में तुम न्यारी हो सबसे मन तुम्हारा पवित्र गंगा सम चाहूँ हो जाए अपना संगम मैं तो एक उड़ती पंछी सी बहती फिरूँ मैं नदियों सी आ बन जा तू मेरा बहेलिया बन नाविक मुझमें समा जा मुझमें तुझको है क्या दीखता भला यह कैसा अपना रिश्ता मन आत्मा का मेल दोनों का रहे ऐसा हीं यह पवित्र रिश्ता सोचता हूँ यह मैं पा लूँ तुझको जीवनपर्यंत ही सम्भालूँ तुझको तुझे दूँ जगत की सारी खुशियाँ निहारूँ बैठ तुम्हारी ये अखियाँ